छत्तीसगढ़ी लोक नृत्य -राउत नाचा | Cg lok nrity raut naacha



Chhattisgarh विभिन्न विधाओं से सम्पन्न राज्य है।chhattisgarh के सभी zilon में कुछ जिले का पहचान यहां के lok nrity तो कुछ जिले का पहचान lok geet तो कुछ जिले का पहचान यहां के पकवान आदि के कारण है।इन सब मे लोक नृत्य का अपना अलग ही महत्व है।इस post के माध्यम से हम यहां के प्रसिद्ध लोक नृत्य 'राउत नाचा 'के बारे में जानने का प्रयास करेंगे।


         
 यादव समुदाय  के लोगों द्वारा यह राउत नृत्य किया जाता है ।इस  समुदाय के लोगों को यादव, रावत,राउत,यदु ,ठेठवार आदि नामों से भी जाना जाता है। गाय, बैल, बकरी को चारा चराना, गायों का दूध निकालना आदि इस समुदाय के ज्यादातर लोगों का कार्य होता है।यादव लोगों का मालिक के प्रति वफादारी के कई किस्से प्रसिद्ध है।

इस नृत्य में मोहरी,झुमका,निशान,जैसे वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है । यह समूह में किये जाने वाला नृत्य है।समूह में दो या तीन व्यक्ति महिला का वेशभूषा धारण किये रहते हैं जिसे परी कहा जाता है।

जब कहीं पर मड़ई मेला का आयोजन रखा जाता है।वहां दूर दूर से नाचने वाले अपने साजो सामान के साथ आते हैं। वहां पर लकड़ी का बड़ा सा खम्भा गड़ा दिया जाता है।जिसे मड़ई कहा जाता है ।कई समूह उसी  स्थान पर इकट्ठे होते है और उस स्थान पर गड़े लकड़ी के खम्भे के चारो ओर घूम घूम कर दोहा कहते हुए नाचते हैं।




यह नृत्य कार्तिक माह के प्रबोधनी एकादशी से प्रारम्भ होता है। यह शौर्य नृत्य है।राउत नाच पुरुषों द्वारा किया जाता है।जिसमें उम्र का कोई बन्धन नही है।किसी भी उम्र का व्यक्ति हो या बच्चे हो नाच में भाग ले सकता है।


राउत नाच करने वाला व्यक्ति  एक हाथ मे डंडा और  दूसरे हाथ मे ढाल पकड़ा रहता है।जितने भी नाचने वाले होते हैं एक ही प्रकार के चमकीले वस्त्र पहने रहते हैं,जो कि बड़ा ही रंग बिरंगा होता है।कमर के नीचे रंगीन हाफ पेंट नुमा वस्त्र या कुछ लोग धोती पहने हुए होते हैं।शिर में बड़ा सा पगड़ी और पगड़ी में लगा झूल ,देखते ही बनता है।पैरों में छन-छन करते घुँघरू की आवाज मन को मोह लेता है।



अलग अलग अवसरों पर अलग अलग दोहे कहे जाते हैं।वर्तमान में राउत नाच प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है ।

दोहे-

1.राम नगरिया राम के बसे गंगा के तीर हो ।
तुलसीदास चन्दन घिसय अउ तिलक लेवय रघुबीर हो।।

2.ए पार नन्दी ओ पार नन्दी बीच म गोरी गाय हो।
  करिया टुरा बेड़े ल भुलागे बेंदरा दुहय गाय हो।।



3.का बाजा बजाए बजनिया मोरो मन नई आय हो।

  के ताल ल छोड़ के झूलन ताल बजाय हो।।

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