छत्तीसगढ़ी कहानी -लालच के नतीजा।chhattisgarhi kahani-laalach ke natija. - हमर गांव

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Tuesday, 4 September 2018

छत्तीसगढ़ी कहानी -लालच के नतीजा।chhattisgarhi kahani-laalach ke natija.


छत्तीसगढ़ी कहानी विविधताओं से भरा हुआ है।कुछ कहानियाँ प्रेम में सराबोर करने वाली तो कुछ कहानियाँ मनोरंजन के साथ-साथ सीख देने वाली होती हैं।
छत्तीसगढ़ी कहानी प्राचीन काल से मौखिक रूप में प्रवाहित होते आ रहा है।छत्तीसगढ़ी कहानी सुनाने के लिए लोगों का पढ़ा-लिखा होना जरूरी नही था।प्राचीन काल में लोगों के पास किसी जानकारी या कविता, कहानी को संजोकर रखने का एक ही साधन था ,मष्तिष्क । लोगों के पास इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प ही नही था।


सारा दिन काम करने बाद रात को खाना बनने तक बच्चों को कहानी सुनाना जिससे बच्चों का मनोरंजन हो।बुजुर्गों का प्रतिदिन का काम होता था। पूरे दिन काम करके शरीर जब थक जाता था कहानी,सुनाने वाले और सुनने वाले दोनों को एक नई ऊर्जा प्रदान करता था ।


इस पोस्ट के माध्यम से एक ऐसे कहानी को प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसमें दोस्त के साथ विश्वासघात किया जाता है और  विश्वासघात करने का परिणाम उसे भूगतना पड़ता है।



                   लालच के नतीजा


एक गांव म दु झन संगी रहयं ।एक के नाव रहय सुकालू अउ दूसर के नाव रहय दुकालू ।दुनों के बीच म अड़बड़ मितानी रहय।दुनों संगे म घुमय,संगे म कहूँ कोती आवयं जायँ।

एक दिन दुनो झन सोचथें ।घर म खाली बइठे म काम नई चलय। साथ म मिल के कुच्छु काम बुता सुरु करे जाय।दुनों झन खूब सोंचिन बिचारिन फेर कोनो दूसर देश म कमाय ल जाय बर तइयार होगें।


दुनो झन अपन-अपन लईका-बच्चा मन ल छोड़ के बैपार करे ल दूसर देश चल देथें, उँहा जाके खूब कमई करथें ।जब बढ़िया कमाधमा लेथें तेखर बाद सोचथें, के अब हमन ला अपन देशराज लहुट जाना चाही।




दुनों अपन-अपन कमाय धन ल धर के अपन देशराज जाए बर निकल जथें। घर आवत रथें त रसता म एक नदिया पड़थे ।नदिया ल पार करत रथें त सुकालू के मन म पाप समा जथे।मन म सोचथे यदि दुकालू ल नदिया म ढकेल देहुं त सब्बो धन ह मोर हो जाहि।

जइसने दुनों झन बीच नदिया म पहुँचथे। सुकालू ह दुकालू ल नदिया म ढकेल देथे।दुकालू ह नदिया म बोहाय लगथे ।दुकालू ह बोहावत -बोहावत कथे सुकालू मैं तो अब नई बाचौं। मोर बेटा मन ल सिरफ एतका कहि देबे-

अगला गेंव परिखिहौ,देइहा की देइहा।
नही त बड़े घर ल ,सरेखिहा त पाइहा।।


अब सब धन ल धर के सुकालू ह गांव आ जथे अउ अपन घर म सब धन ल धर देथे।दुकालू के लईका मन ल पता चलथे सुकालू कक घर आगे हे ।




 दुकालू के लइका मन पुछथें के हमार बाबू जी कहाँ हे त सुकालू ह मुड़ी म हाथ ल रख के कथे-का बताववं बेटा हो कमाकूद के आत रहेन रसता म नदिया ल नाकत खनी तोर बाबूजी ह जतका कमाय धमाय रहिस हे तेखर सुध्धा पानी म बोहा गिस हे।


पानी म बोहावत बोहावत एक ठन बात बताय ल कहिस हे।मोला तो कुच्छु समझ म नई आइस हे।दुकालू के लईका मन पूछथे का कहिस हे कक, सुकालू ह दुकालू के कहे बात ल बताथे।

आगला गेंव परिखिहौ,देइहा की देइहा।
नही त बड़े घर ल ,सरेखिहा त पाइहा।।



दुकालू के लईका मन बात ल सुनते ही समझ जथें।काबर के ओखर दद ह कहे रथे-ए आदमी ल परख लेहौ,मोर कमाय धन ल देही त दही नही त एखर बड़े घर ल खोजहू त पाहू।

दुकालू के लईका मन पुलिस ल बुला के लाथें अउ सब बात ल बताथें।पुलिस ह सुकालू के बड़े घर ल खोजथे त दुकालू के कमाय धन ह मिल जथे।

पुलिस मन सुकालू ल थाना म लाके पूछथें त सब बात ल बताथे-कइसे धन के लालच म दुकालू ल नदिया म ढकेल दे रहिस हे।

दुकालू के चलाकी अउ लईका मन के सूझबूझ के कारन उंखर दद के कमाय धन ह मिल जथे अउ सुकालू ल जेल तको भेजवा देथें।

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इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कभी भी दोस्ती में विश्वासघात नही करना चाहिए।किसी को कमजोर नही समझना चाहिए।बुरे कर्मो का फल बुरा ही होता है इस लिए कभी भी ऐसा नही समझना चाहिए कि मैं कुछ भी कर लूँ कोई सुराख़ नही मिलेगा । कर्म का फल मिलता ही है ।बुरा कर्म करने से बुरा परिणाम और अच्छा कर्म करने से परिणाम  भी अच्छा मिलता है।


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