छत्तीसगढ़ी लोक खेल व खेलगीत chhattisgarhi lok khel geet - हमर गांव

Latest

Monday, 10 December 2018

छत्तीसगढ़ी लोक खेल व खेलगीत chhattisgarhi lok khel geet


छत्तीसगढ़ की एक प्राचीन संस्कृति जो कि आज जन मानस से मिटते जा रही है। वह है,छत्तीसगढ़ के लोक खेल और उसमें गाए जाने वाले गीत।इन खेल गीतों को सुनते ही एक अजीब सी उमंग मन में हिलोर लेने लगती है। और बचपन के दिनों की यादें ताजा कर देती है।


 ये लोक खेल व गीत हमारी संस्कृति की पहचान है।आज कल बच्चों से लेकर सभी उम्र के लोगों का झुकाव राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खेलों की ओर होने के कारण ये पारम्परिक खेल गीत लुप्त होते जा रही है।समय रहते इन पारम्परिक खेल व खेल गीतों को बचाने की दिशा में कोई प्रयास नही किया गया तो इस प्राचीन संस्कृति का अंत हो जाएगा।   
तो चलिए इन खेलों व खेल गीतों को जानने का प्रयास करते हैं।



1.अटकन बटकन-

अटकन बटकन के खेल को गोल आकृति में बैठकर खेला जाता है।इस खेल में खिलाड़ियों की  कोई निश्चित संख्या का होना जरूरी नही है। इस खेल को लड़के व लड़कियाँ दोनों साथ मिलकर खेल सकते हैं

सभी अपने दोनों हाथों के पंजे को जमीन में रखते हैं और एक खिलाड़ी अपने उंगली को बारी बारी से सभी के पंजे के ऊपर रखते हुए।इस कविता को बोलता है-
अटकन बटकन दही चटाका
लउहा लाटा बन के कांटा
सावन म करेला फूटे 
चल-चल बेटी गंगा जाई
गंगा ले गोदावरी
आठ नांगा पागा 
गोलार सिंघ राजा
चुरचुट्टी बुंदेला 
तोर सास के खंधेला
आमा के डार टुटगे
पठान टुरा जूझगे

जिसके पंजे में आखरी लाइन-पठान टुरा जुझगे आता है,वो अपने पंजे को मुट्ठी बांधकर पीछे छिपा लेता है।इस प्रकार बारी बारी से सभी अपने अपने पंजे को मुट्ठी बांधकर पीछे छिपाते जाते हैं।फिर खेल का अगला राउंड शुरू होता है।

अब एक खिलाड़ी बारी बारी से सबसे पूछता है कि
तोर हाथ ल कोन लेगे हे?
जिससे पूछता है वह कहता है कि मोर हाथ ल भालू ले गे हे।
दूसर हाथ ल कोन लेगे हे ?
फिर ओ कहता है कि मोर दूसर हाथ ल शेर लेगे हे।
मांग के ला
फिर ओ अपना मुट्ठी खोलकर दिखाता है सभी से ऐसे ही सवाल कर हाथ को सामने कराया जाता है।
इस प्रकार यह खेल पूरा हो जाता है।

2.गोल गोल रानी-
इस खेल में खिलाड़ियों की संख्या निश्चित नही रहता है।इस खेल में एक बच्चा बीच मे होता है और बाकी बच्चे एक दूसरे का हाथ पकड़े उसके चारों ओर घूमते हुए ये कविता दुहराते हैं-

 सभी बच्चे-गोल गोल रानी 

बीच वाला- घुठुवा भर पानी
सभी बच्चे-गोल गोल रानी
बीच वाला- माड़ी भर पानी
सभी बच्चे- गोल गोल रानी
बीच वाला -कनिहा भर पानी
सभी बच्चे-गोल गोल रानी
बीच वाला- छाती भर पानी
सभी बच्चे-गोल गोल रानी
बीच वाला-टोटा भर पानी
सभी बच्चे-गोल गोल रानी
बीच वाला-मुड़ भर पानी
सब बच्चे- गोल गोल रानी
बीच वाला- छपछप भर पानी
बीच वाला-तारा टोर के भागूंगी
सभी बच्चे-बाहरी के मुठिया लगाऊँगी।

फिर बीच मे घिरा बच्चा घेरा तोड़कर भगता है सभी उस बच्चे उसे पकड़ने के लिए दौड़ाते हैं।जहाँ पर पकड़ा जाता है वहाँ से दो लोग उसे उठाकर कर खेल वाले स्थान तक लाते हैं। बाकी लोग नीचे लिखे गीत को गाते हुए पीछे पीछे चलते हैं-


मोर चिरई के गोड़ टुटगे कहाँ बिहाय ल जौं

मोर चिरई के गोड़ टुटगे कहाँ बिहाय ल जौं
मोर चिरई के गोड़ टुटगे कहाँ बिहाय ल जौं

इस प्रकार बारी बारी से सभी को मौका दिया जाता है और इस प्रकार खेल खत्म हो जाता है।


3.तिरी मिरी कोशा-

इस खेल में सभी बच्चे गोल आकृति में बैठते हैं और अपने अपने हथेली को एक के दूसरे के हथेली के ऊपर रखते हैं।
एक खिलाड़ी अपने मुट्ठी और कोहनी को बारी बारी से सब के हथेली के ऊपर रखता है और ये गाता है।


अताल के रोटी पताल के धान 

इसको लनदी धर बुची कान।

जैसे ही धर बुची कान बोला जाता है ,जिसका हथेली ऊपर में होता है वो अपने अगल बगल वाले का कान को  पकड़ता है।इस प्रकार जिसका हथेली ऊपर आते जाता है वो अपने अगल बगल वाले का कान पकड़ता जाता हैं।सभी जब एक दूसरे का कान पकड़ लेते हैं तो खेल का दूसरा चरण शुरू होता है।

सभी एक दूसरे का कान पकड़े ये गाते हैं-
तिरिमिरी कोशा 
कन्हइया गावै गो सा...

तिरिमिरी कोशा 

कन्हइया गावै गो सा...

इस कविता को तब तक बोला जाता है जब तक एक दूसरे के कान से हाथ न छूट जाय।जब हाथ एक दूसरे के कान से छूट जाता है तब खेल खत्म हो जाता है।

4.फुगड़ी-

फुगड़ी के खेल शुरू होने से पहले सभी खिलाड़ी उकरु बैठकर अपने अपने हाथों से जमीन को लिपाई करने जैसा हथेली को घुमाते घुमाते इस गीत को गाते हैं-

गोबर दे बछरू गोबर दे,

चारो खूँट ल लिपन दे।
चारो देवरानी ल बइठन दे,
अपन खाथे गुदा ल,
हमला देथे बीजा ल।
ए बीजा ल का करबो,
रहि जाबो तीजा।
तीजा के बिहान भर ,
घरी-घरी लुगरा।
पिहुँ पिहुँ करत हे मंजूर के पिला,
हेर देबे भउजी कपाट के खिला।
एक गोड़ म लाल भाजी ,
एक गोड़ म कपूर ।
कइसे के मानव देवर ससुर,
फुगड़ी रे फाँय फाँय, फुगड़ी रे फाँय........

फुगड़ी खेलते समय जो गिरते जाते हैं वो खेल से बाहर होते जाते हैं।अंत तक जो नही गिरता और अकेले बच जाता है वह विजयी घोषित होता है।



5.चिल्लम ची-

चिल्लम ची का खेल सामूहिक खेल है इस खेल को लड़की लड़का दोनों खेल सकते हैं।इस खेल में सभी एक दूसरे का हाथ पकड़े अर्द्ध चंद्रकार में फैले रहते हैं।
फिर एक छोर वाला दूसरे छोर वाले को कहता है-

 पहले छोर वाला-चिल्लम ची
दूसरा छोर वाला-कइसे जी
पहला छोर वाला-काखर शादी
दूसरा छोर वाला- रामु के
पहला छोर वाला-का बाजा
दूसरा छोर वाला- बैंड बाजा

सभी बच्चे एक दूसरे का हाथ पकड़े बैंड बाजा की आवाज निकालते निकालते दो लोगों के बीच से गुजरते हैं।चूंकि सभी एक दूसरे का हाथ पकड़े रहते हैं इस लिए जिसके बीच से गुजरते हैं उसका चेहरा पीछे की ओर ही जाता है। सभी को बारी बारी अलग अलग बाजे के आवाज के साथ घुमाया जाता है फिर एक छोर वाला दूसरे छोर वाले से कहता है-
पहले छोर वाला-चिल्लम ची 
दूसरे छोर वाला-कइसे जी 
पहले छोर वाला-ढील दौं के बांध दौं



बांध दे कहने पर सभी एक दूसरे का हाथ पकड़े रहते हैं और ढील दे कहने पर सभी एक दूसरे का हाथ छोड़कर नाचने लगते हैं।


>>छत्तीसगढ़ के पारम्परिक लोक खेल व खेलने के तरीके।


अपने इस अमूल्य संस्कृति को बचाने के लिए इसे अधिक से अधिक शेयर जरूर करें।आप इस पोस्ट के बारे में हमें अपना राय जरूर देें। इसके लिए नीचे कमेंट बॉक्स दिया गया है।जय छत्तीसगढ़ जय संस्कृति




No comments:

Post a Comment